Friday, May 13, 2016

पर्जन्य पत्नी: According to Vedas Cow and Clouds are like husband & Wife

Cow ensures a prosperous right thinking community & sustainable environment
6. यज्ञपदीराक्षीरा स्वधाप्राणा महीलुका ।
 वशा पर्जन्यपत्नी देवां अप्येति ब्रह्मणा  । । AV10.10.6
गौमाता (यज्ञपदी) यज्ञकर्म करने की प्रेरण देने वाली उत्तम मानसिकता और कर्म करने की प्रेरणा देने वाली , (इराक्षीरा) अन्न और दूध देने वाली , (स्वधाप्राणा) अपने  को अपनाने वालों को स्वतंत्र बनाती है, (महीलुका) पृथिवी गोचर - जिस का विशिष्ट  स्थान है,  वह (वशा) गौ माता (पर्जन्यपत्नी) मेघों से वर्षा के द्वारा सब का पालन करने वाली,  (देवां अप्येति ब्रह्मणा) देवता स्वरूप ज्ञानी जनों को प्राप्त होती हैं  | 
पर्जन्यपत्नी की व्याख्या ;
गृहस्थ में पत्नी जब होती है तब पति पत्नि के साथ रहता है | पत्नि के बिना पति अकेला पड़ कर इधर उधर मारा मारा आवारा फिरता है | गौ और पृथ्वी दोनोंही माता का रूप हैं | बिना गौओं के पृथ्वी भी अधूरी माता है |
 आधुनिक विज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है कि जहां पृथ्वी पर गौएं  होती हैं पर्जन्य – मेघ  भी वहीं वर्षा करते हैं | और पृथ्वी भी जहां गौएं होती हैं वहीं पर  वर्षा के जल को अपने अंदर ऐसे संचित कर के रखती है जैसे रेतस  योनि में | और वर्षा के जल से पृथ्वी वनस्पति रूप संतान देती है | जहां पृथ्वी पर गौ नहीं होंगी वहां पृथ्वी बांझ हो जाएगी , और मेघ भी वहां वर्षा करने के लिए नहीं आएंगे | जहां पृथ्वी पर गौएं होती हैं वहां वर्षा  से पृथ्वी हरी भरी रहती है |
 (गोचर का गौ  के लिए यही  महत्व है , जो दक्षिण अफ्रीका के वैज्ञानिक एलेन सेवोरी के  अनुसंधान से यह  सिद्ध भी हो गया है |  वह भूमि जहां गौओं का गोबर और गोमूत्र गौओं के खुरों द्वारा मट्टी में रोंद दिया जाता है वहां मट्टी में वर्षा के जल को सोख लेने की क्षमता बहुत बढ़  जाती है | हरयाली बनी रहती है |  हरयाली में पनप रहे सूक्ष्म जीवाणु  द्वारा आकाश में बादलों को प्रभावित कर ने से वर्षा होतीहै | जिस के परिणाम स्वरूप गोचरों में हरयाली बनी रहती है |  इसी लिए वेद ने गौ को पर्जन्यपत्नी: बताया  प्राचीन काल में गोचर बहुत  बड़े  होते थे | जब गोचर के क्षेत्र से गौएं घास खा लेती थीं तब जो क्षेत्र घास वाले होते थे वहां चली जाती थीं | इस प्रकार गोचर में घास की कभी कमी नहीं रहती थीं | आधुनिक काल में गोचरों का संचालन managed pastures एक वैज्ञानिक विषय है |  हमारे देश में भी गोचर विकास और प्रबंधन  भी पशुपालन शिक्षा अनुसंधान पर कार्य होना चाहिए |

{Landslides in Hills, Desertification of land  Rain Making in  Modern Science & Vedas
(Subodh Kumar)
Man in his pursuit  for urbanization  has drastically reduced the green cover on ground . According to current policy of our Forest Department for conservation of forests entry of cattle for grazing  and humans from getting firewood has been banned  . To discourage the entry of rural folks for getting leaf fodder from naturally growing ‘Banjh’ Quercus family  – a dual purpose leaf fodder and firewood trees have  been gradually replaced with planting of Pine trees. Pine needle fallen from the trees smother the green undergrowth by mulching. This results in total loss of green undergrowth on the Himalayas. The rain inducing bacteria Pseudomonas Syringe get eliminated from the environment.  This is resulting in turning our green Himalayas in to deserts without rains.
 The roots system of the green undergrowth also plays a very important role of soil stabilization. This in turn prevents soil erosion, landslides and floods in the hilly areas.
 Although vegetative cover is known to help rain precipitation, but absence of these microorganisms in thin vegetations could be an explanation for Monsoon clouds bypassing certain green areas. The semiarid and Arid regions having thin vegetation, remain dry in spite of the fact that monsoon clouds pass over these areas.
Science tells us nothing can be created from nothing. For making any rains it is necessary to have water bearing clouds. Till recently the phenomenon of precipitation of clouds was considered only on basis of physical sciences, and artificial rain making experiments were made with solid dry ice to initiate precipitation. But now with developments in biotechnology the role played by microorganisms in rain making is getting to be noticed.
P. syringae also produce  a protein which cause water to freeze at fairly high temperatures, resulting in injury to plants. Since the 1970s, P. syringae has been implicated as an atmospheric "biological ice nucleator", with airborne bacteria serving as cloud condensation nuclei. Recent evidence has suggested that the species plays a larger role than previously thought in producing rain and snow. They have also been found in the cores of hailstones, aiding in bioprecipitation.[5] These Ina proteins are also used in making artificial snow.[6]
Discovery of the role of bacteria such as Pseudomonas Syringe in nucleation of ice at higher temperatures opens the possibility that these bacteria can facilitate precipitation from water bearing clouds  at the prevailing temperature. These bacteria are found profusely in green and rotting leaves at the ground levels. These bacteria are also known to spread very widely in the atmosphere and reach cloud heights on their own. At cloud levels they cause nucleation of ice at the prevailing cloud temperatures, and this induces the clouds to release rains. In absence of these bacteria clouds will have to travel to far colder higher mountainous regions to cause precipitation if any, and thus bypass many areas that were used to experience good rains in the past.
 This microbiological phenomenon, to initiate precipitation of rains is described by the scientists in the report give below.
There are enumerable references in Vedas to artificial rain making activities and specific Yagyas are described to promote rains.   Yagyas can only be the facilitators for inducing the water bearing clouds to release the rains. Even some past experiments by scientists in India could not establish a positive result of Yagyas.( more due to our lack of scientific insights). In presence of widely present vegetation the environments could be rich with rain inducing microbes .  Yagyas performed in such environments could facilitate the transport of these microbes to higher cloud level altitudes and induce precipitation.
This makes it very easy to understand the scientific wisdom of the following Ved mantra from Rig Ved. 
  ऋग्वेद 1/37/11 मरुतो देवता:
त्यं चिद् घा दीर्घं पृथुं मिहो नपातम मृध्रम् !
प्र च्यावयान्ति  यामाभि: !!
(It is important to bear in mind that according to modern science of microbiology, the entire universe is pervaded by microbes. All life science phenomenons are  progressively being conceive to be caused by actions initiated by microbial populations. In Vedas ‘Maruts’ मरुत are what modern science describes as microbes. Winds, Atmosphere, Rizosphere, Biosphere in fact every physical reality is permeated by Microbes.  This in turn is precisely the case with Maruts as described in Vedas.)
इस वेद मंत्र के तीन भाष्य निम्न लिखित प्राप्त होते हैं
1.महर्षि दयानंद कृत भाष्य से, मरुत देवता , (मिह: ) वर्षा जल से सींचने वाले पवन (यामाभि: )अपने जाने के मार्गों से (घ) ही (त्यम्) उस (नपातम्) जलो को  न गिराने  और (अमृघ्रम्) गीला न करने वाले (पृथुम्) बडे (चित्) भी (दीर्घम्) स्थूल मेघ को (प्रच्यावयान्ति) भूमि पर गिरा देते हैं.
2.सायण भाष्य: (मरुद्गण) निश्चय कर के उस किसी लम्बे चौडे न रोके जाने वाले मेघ के पुत्र (वर्षा) को अपनी यात्राओं के साथ हाँक कर ले जाते हैं.
3.दामोदर सातवलेकर भाष्य: (त्यं चित् घ) उस प्रसिद्ध (दीर्घ) बहुत लम्बे (पृथुं) फैले हुवे (अमृघ्रं) जिस का कोई नाश नही कर सकता ,ऐसे (मिह: न पातं)जल की वृष्टि न करने वाले मेघ को भी यह वीर मरुत् (यामाभि: ) अपनी गतियों से (प्र च्यावयन्ति) हिला देते हैं.
तीनो विद्वत् महानुभावों के उपरोक्त भाष्यों मे एक मुख्य विषय निर्विवादित है कि ऐसे लम्बे बडे मेघों से जो वर्षा नही करते मरुद्गण अपने प्रभाव से वर्षा करा देते हैं
यह कैसे सम्भव होता है इस को आज आधुनिक विज्ञान इस प्रकार बता रहा है.पृथ्वी पर उत्पन्न हरियाली और गले सडे पत्तों मे जो सूक्ष्म जीवाणु पाए जाते हैं उन मे से कुछ को स्यूडिमोनस सिरिंगै के  नाम से जाना जाता है . यह सूक्ष्म जीवाणु हरे पत्तों पर पलते हैं औरवायुमंडल मे फैल कर आकाश की ओर मेघ मंडल तक पहुंच जाते हैं. इन जीवाणुओं मे मेघ मंडल मे वहां के ताप मान पर ही हिम कण उत्पन्न करने की क्षमता होती है. इसी सूक्षमाणु  के प्रभाव से मेघ मंडल वर्षा करने को बाध्य हो जाता है.
यदि मनुष्य अपने स्वार्थ वश पृथ्वी पर वनस्पति हरयाली की मात्रा को कम कर देता है, या ऐसे वृक्ष लगाता है जैसे पहाडों पर चीड (pine), जिस से पृथ्वी की हरयाली कम या समाप्त हो जाती है तो स्पष्ट है कि पृथ्वी पर वर्षा के उपयोगी मरुद्गणों का अभाव हो जाएगा. जिस के  परिणाम स्वरूप  वर्षा का अभाव हो जाएगा.
ऐसे क्षेत्रों मे जहां पर्याप्त हरयाली और वर्षा उपयोगी मरुद्गण वतावरण मे  उपस्थित हों वहां विशेष यज्ञ द्वारा इन मरुद्गणों को मेघमन्डल मे पहुंचाने मे यज्ञाग्नि सहायक हो कर शीघ्र वर्षा कराती है. यह कैसे सम्भव होता है इस को आज आधुनिक विज्ञान इस प्रकार बता रहा है.पृथ्वी पर उत्पन्न हरियाली और गले सडे पत्तों मे जो सूक्ष्म जीवाणु पाए जाते हैं उन मे से कुछ को स्यूडिमोनस सिरिगै के  नाम से जाना जाता है . यह सूक्ष्म जीवाणु वायुमंडल मे फैल कर आकाश की ओर मेघ मंडल तक पहुंच जाते हैं. इन जीवाणुओं मे मेघ मंडल मे वहां के ताप मान पर ही हिम कण उत्पन्न करने की क्षमता होती है. एसी के प्रभाव से मेघ मंडल वर्षा करने को बाध्य हो जाता है.
ऐसे क्षेत्रों मे जहां पर्याप्त हरयाली और वर्षा उपयोगी मरुद्गण वतावरण मे  उपस्थित हों वहां विशेष यज्ञ द्वारा इन मरुद्गणों को मेघमन्डल मे पहुंचाने मे यज्ञाग्नि सहायक हो कर शीघ्र वर्षा कराती है.
वि वृक्षान् हन्त्युत हन्ति रक्षसो विश्वं बिभाय भुवना महावधात्
उतानागा ईषते वृष्ण्यावतो यत् पर्जन्य: स्तनयन् हन्ति दुष्कृत: ।। RV 5.83.2

ऋग्वेद के मंत्र अनुसार जो व्यक्ति वृक्ष काटते हैं  वे वर्षा के शत्रु होते हैं उन्हे राक्षसों जैसा दण्ड देना चाहिये.
AV 4.15 वृष्टि प्रार्थना For Rain
1. समुत्पतन्तु प्रदिशो नभस्वतीः सं अभ्राणि वातजूतानि यन्तु  ।
 महऋषभस्य नदतो नभस्वतो वाश्रा आपः पृथिवीं तर्पयन्तु  । ।AV4.15.1
(वर्षा के जल ) बादलों से युक्त उमड़ कर उठें, वायु से सेवित   मेघ मिल कर बड़े वृषभों की तरह गर्जन करते हुए आएं, वेगवती जल की धाराओं से पृथ्वी को तृप्त करें.
2. सं ईक्षयन्तु तविषाः सुदानवोऽपां रसा ओषधीभिः सचन्तां  ।
 वर्षस्य सर्गा महयन्तु भूमिं पृथग्जायन्तां ओषधयो विश्वरूपाः  । । AV4.15.2
बड़े बलशाली महान दान शील मरुत ( सूक्ष्माणु) भलीभांति वर्षा की बौछारों को औषधि तत्वों से परिपूर्ण कर के भिन्न भिन्न स्थानों पर उत्पन्न होने वाले अन्न और औषधीय लताओं वनस्पतियों की वृद्धि करें .
वर्षा  के लोक गीत
3. सं ईक्षयस्व गायतो नभांस्यपां वेगासः पृथगुद्विजन्तां  ।
 वर्षस्य सर्गा महयन्तु भूमिं पृथग्जायन्तां वीरुधो विश्वरूपाः  । । AV4.15.3
आकाश में मेघों को देखने की, भिन्न भिन्न स्थानों पर वेग पूर्वक वर्षा की धारओं से विविध रूप वाली वनस्पतियों के उत्पन्न होने की आकांक्षा गायन द्वारा स्तुति की प्रेरणा दें. 
वर्षा के लोक गीत
4. गणास्त्वोप गायन्तु मारुताः पर्जन्य घोषिणः पृथक् ।
 सर्गा वर्षस्य वर्षतो वर्षन्तु पृथिवीं अनु  । । AV4.15.4
पृथक पृथक स्थानों पर वर्षा के , मेघों के पृथ्वी  पर बरसने के यशोगान हों .
सूक्ष्माणु द्वारा वाष्पी करण
5. उदीरयत मरुतः समुद्रतस्त्वेषो अर्को नभ उत्पातयाथ  ।
 महऋषभस्य नदतो नभस्वतो वाश्रा आपः पृथिवीं तर्पयन्तु  । । AV4.15.5
समुद्र से जलों को ऊपर अंतरिक्ष में चमकते हुए सूर्य के साथ सूक्ष्माणु  गरजते हुए बादलों से वेगवती जल की धाराओं से भूमि को तृप्त करें
गोचर की समृद्धि
6. अभि क्रन्द स्तनयार्दयोदधिं भूमिं पर्जन्य पयसा सं अङ्धि  ।
 त्वया सृष्टं बहुलं ऐतु वर्षं आशारैषी कृशगुरेत्वस्तं  । । AV4.15.6
गर्जना करते हुए, कड़कते  हुए बादल समुद्र को हिला दें.  जल से भूमि को कांतिमयि बना दें. वर्षा की झड़ी से दुर्बल गौओं के लिए गोपालक (गोचर के लिए)  अच्छी  वर्षा की इच्छा करता है .

7. सं वोऽवन्तु सुदानव उत्सा अजगरा उत  ।
 मरुद्भिः प्रच्युता मेघा वर्षन्तु पृथिवीं अनु  । । AV4.15.7
अजगर के समान मोटेमोटे जल आकाश से गिरती हुइ जल की धाराएं  सूक्ष्माणुओं से संचालित मेघ पृथ्वी पर सुरक्षा के लिए अनुकूल वर्षा करें

8. आशामाशां वि द्योततां वाता वान्तु दिशोदिशः  ।
 मरुद्भिः प्रच्युता मेघाः सं यन्तु पृथिवीं अनु  । । AV4.15.8
आकाश में सब दिशाओं में बिजली चमके,सब दिशाओं मे वायु चले, सूक्ष्माणुओं से प्रेरित मेघ भूमि को अनुकूल बनाने के लिए आएं.

9. आपो विद्युदभ्रं वर्षं सं वोऽवन्तु सुदानव उत्सा अजगरा उत  ।
 मरुद्भिः प्रच्युता मेघाः प्रावन्तु पृथिवीं अनु  । । AV4.15.9
सूक्ष्माणुओं  से प्रेरित मेघों में विद्युत, अजगर के समान मोटे मोटे जल का दान करने वाले वर्षा के झरने पृथ्वी को अनुकूल बना कर रक्षा करें.
वर्षा जल का महत्व
10. अपां अग्निस्तनूभिः संविदानो य ओषधीनां अधिपा बभूव  ।
 स नो वर्षं वनुतां जातवेदाः प्राणं प्रजाभ्यो अमृतं दिवस्परि  । । AV4.15.10
(वर्षा के ) जलों में जो अग्नि गुण हैं ,जलों के शरीरभूत बादलों से मिली हुई , जो इस जलों को ओषधि गुण द्वारा वनस्पतियों की रक्षक और पालक होती हैं वह अग्नि  प्रकट हो कर हमें वर्षा को प्रदान करे. वे जल बुद्धि मान जन जानते हैं कि वे   द्युलोक से आने वाले अमृत रूप धारण करके प्रजा के प्राण हैं .
वर्षा का जल पृथ्वी का वीर्य
11. प्रजापतिः सलिलादा समुद्रादाप ईरयन्नुदधिं अर्दयाति ।
 प्र प्यायतां वृष्णो अश्वस्य रेतोऽर्वानेतेन स्तनयित्नुनेहि  । । AV4.15.11
(प्रजापति) प्रजा का  रक्षक परमेश्वर (सलिल) साधारण  जल को समुद्र को पीड़ित कर-वाष्प बना कर व्यापनशील मेघ के रूप में अन्तरिक्ष की ओर ले जा कर गर्जने वाले मेघ से वीर्य की भांति खूब वृद्धि के लिए पृथ्वी की ओर नीचे वर्षा करता है.
12. अपो निषिञ्चन्नसुरः पिता नः श्वसन्तु गर्गरा अपां वरुणाव नीचीरपः सृज।
 वदन्तु पृश्निबाहवो मण्डूका इरिणानु  । । AV4.15.12
वर्षा का जल प्राणों को देने वाले मेघ से उत्पन्न हमारा पिता-समान  है , जो बादलों की गड़गड़ाहट की ध्वनि से जलों को नीचे की ओर छोड़ता है, पृथ्वी पर  गड्ढों में रहने वाले  भिन्न भिन्न रंग बिरंगे मेंढक इत्यादि हर्षसे खूब टर्र टर्र करते हैं .

13. संवत्सरं शशयाना ब्राह्मणा व्रतचारिणः ।
 वाचं पर्जन्यजिन्वितां प्र मण्दूका अवादिषुः  । । AV4.15.13
वृष्टि के लिए वार्षिक व्रत सम्पन्न करने वाले ब्राह्मणो की नांई, साल भर सोये पड़े मेंढक वर्षा से तृप्त हुई वाणीको खूब ज़ोर से  बोलते हैं. 

14. उपप्रवद मण्डूकि वर्षं आ वद तादुरि ।
 मध्ये ह्रदस्य प्लवस्व विगृह्य चतुरः पदः  । । AV4.15.14
हे मेंढक मेंढकी के परिवार वर्षा को देख कर आनंद से चारों पैर फैला कर खूब क्रीड़ा करो  और बोलो .  
वर्षा की कामना
15. खण्वखा३इ खैमखा३इ मध्ये तदुरि  ।
वर्षं वनुध्वं पितरो मरुतां मन इछत  । । AV4.15.15
(खण्वखा३इ खैमखा३इ मध्ये तदुरि)   ईड़ा पिंगला सुषम्ना के मध्य मन को केंद्रित  कर के  मरुतों से  अनुकूल  हो कर वर्षा द्वारा हमारा पितरों कि तरह पालन करने की कामना करो..

16. महान्तं कोशं उदचाभि षिञ्च सविद्युतं भवतु वातु वातः ।
 तन्वतां यज्ञं बहुधा विसृष्टा आनन्दिनीरोषधयो भवन्तु  । । AV4.15.16
(आप लोग)  खूब यज्ञादि कर के महान आनंद दायक समृद्धि और ओषधि के कोष को विद्युत और पवन के साथ वर्षा की धाराओं  द्वारा समस्त संसार को सींचो  

David Sands, professor at the Department of Plant Sciences and Plant Pathology, Montana State University, usa, hypothesized that there is a link between rainfall and bacteria in 1982. He didn't find many takers then. He has recently proved that bio precipitation does actually happen. He talks to Kirtiman Awasthi about the experiment and its implications

Findings
We have found that airborne bacteria may play a big role in the precipitation cycle. The bacteria act as nuclei around which ice forms. These biological nuclei can cause freezing at warmer temperatures.

Bacteria
There are three to four species of bacteria that are capable of ice nucleation. One of them, Pseudomonas syringae, is abundant in cool and wet season.The bacterium does not survive in hot (over 30°c) and dry weather. Though a pathogen, it generally survives as a saprophyte (on the plant surface) without causing diseases. These are not pathogenic to humans or animals because they cannot grow at body temperatures. The bacteria are also found in ice and rain drops at higher altitudes, which indicates they play a role in bio precipitation.

Process
Bacteria multiply on the surface of plants and wind then sweeps them into the atmosphere. Water clumps around the bacterium, leading to rainfall. When precipitation occurs, the bacteria make it back to the ground. Even if one bacterium lands on a plant, it can multiply and form groups, thus causing the cycle to repeat.

Experiment
We tried to show that the process holds true by carrying out an experiment. We treated 28 tonnes of wheat seeds with a copper bactericide and planted it in 400 hectares of dry land during spring in Montana. We found the bacteria appeared on the crop. As there were rainstorms during that period, we decided to see if these bacteria were in the air above the field. We held out simple samplers from the window of a small plane which was flown over the experimental field. We were able to detect these bacteria as high as 2 km above the ground. In the lab we then determined that they were ice nucleation active.

Over the years
We didn't receive a particularly positive response from other scientists when we introduced the concept of bio-precipitation at a meeting in Budapest, Hungary, in 1982. In the past 25 years, the science pertaining to these bacteria has progressed considerably. There are dna tests for identification and their genetics are now better understood. There are now large computers capable of providing us with models of clouds and sophisticated forecasting and backtracking of storms. Dead Pseudomonas syringae have been used for 20 years in water cannons to enhance snow making for ski resorts, so we know that they do not just function as ice nuclei in the laboratory. But live bacteria perform better. We found that killing bacteria by boiling or adding enzymes does not lead to effective ice nucleation.

Global warming
Since the bacteria does not grow above 30°c, precipitation could be affected if world's temperature rises. However, compared to other nucleants such as carbon dioxide and silver iodide, the bacteria may still function as effective nuclei. This is because the bacteria are capable of getting water to freeze at temperatures just below 0°c, (-2°c to -7°c), whereas other nucleants require temperatures that are 10-12°c colder.

Precipitation patterns
There are two kinds of approaches to changing global precipitation patterns. One is to let them happen, and the other is to try to ask if we have been unknowingly affecting precipitation by overgrazing, cropping systems, etc. The next step would be to ask what can we do to avert any damage. People have been trying to modify weather for a long time, without much success. Perhaps it is because there have been these bit part biological players in the game.

Implications
A reduced amount of bacteria on crops could affect climate. Also, overgrazing in a dry year could actually decrease rainfall, which could then make the next year even dryer. Drought could be less of a problem once we understand how rainfall is linked to bacteria.

Spread extent
These bacteria have been found almost everywhere but we do not know the extent of their activities, ice nucleation or otherwise. We need to study weather patterns relative to vegetation that supports such bacteria.
Date:
14/04/2008

Source:

Down to Earth Vol: 16 Issue: 20080415}

Thursday, May 12, 2016

Importance of Cow as per Yajurved

वेदों में गौ सम्बोधन पोषण प्रदायक दिव्य शक्तियों के लिए हुआ है |पशु रूप गौ पर भी यह सब परिभाषा पूरी तरह से लागू होती है |
In Vedic language all word Go गो represents all Poshan daayak पोषण दायक - thriving, prosperity, abundance, wealth, growth providers. All these terms equally apply to physical Cow

Salutation: गोस्तुति  
 Y-3-20 Importance of Cow  
 Addressing the Cow-
अन्ध स्थान्धो वो भक्षीय मह स्थ महो वो भक्षीयोर्ज स्थोर्जं वो भक्षीय रायस्पोष स्थ रायस्पोषं वो भक्षीय ।। यजु-3-20
गौ ही अंध:- अन्नदात्री, मह-वीर्यदात्री,उर्जा- बल व प्राणदात्री, रायस्पोष- धन का पोषण करनेवाली हैं.    - -
हे गौ तुम भी  सब इच्छा  करने योग्य पदार्थों का अक्षय प्राप्ति स्थान हो। (सबसे प्रथम इच्छा करने योग्य पदार्थ अन्न है।) यह भक्षणीय पदार्थ हमारे ऊर्जासुखसमृद्धि का  साधन है।

Cows you are the provider of most desirable objects. Food is the first most desirable. Food provides sustainable energy for our joys of wellbeing and prosperity. Cows are the provider of all. (First Bible prayer is also 'Give us this day our daily bread')

 रेवती रमध्वमस्मिन्योनावस्मिन्गोष्ठेऽस्मिँल्लोकेऽस्मिन् क्षये । इहैव स्त मापगात।। यजु 3-21
हे गौ तुम वास्तव में विश्व की ,  इस भूमि की हमारे निवास स्थान की परम धरोहर हो । तुम हमारे समीप ही सदा  रहो। हमें छोड़ कर मत जावो।
( गौ ही घर का वास्तविक धन है. गौ के घर पर  न रहने से  शरीर,मन व बुद्धि सब ह्रास हो जाता है , मानव  निर्धन बन जाता है. शरीर रोगी हो जाता है, मन मलिन हो जाता है, और बुद्धि मन्द हो जाती है.) 

Cows you are the embodiment of entire desirable wealth, on our lands and in our homes in this world.  Live here with us with our love in peace and never go away  from us.

 संहितासि विश्वरूप्यूर्जा माविश गौपत्येन।
        उपत्वाग्ने दिवे दिवे दोषावस्तर्ध्दिया वयम्‌।
        नमो भरन्त एमसि ।। यजुर्वेद 3.22
गौ माता विश्व के लिए बुद्धि रूप गुणयुक्त सब पदार्थअन्नादि के भरणप्रतिदिन अग्नि ऊर्जा प्रदान करने के साधन  उपलब्ध कराती है। यथार्थ में गौ  का पृथ्वी पर वेदों जितना ही महत्व है। हम गौ को पूजनीय मानते हैं।

Cows have the same importance for the world as Vedas. The cows are responsible for the beautiful glow of brilliance and energy of the world. Day by day growing bounties in the world flow from the cows.  We pay homage to bountifull cows
1.04 राजन्तमध्वराणां गोपमृतस्य दीदिविम्‌ |
        वर्द्धमानँ स्वे दमे || ऋ1.1.8, यजुर्वेद 3.23
श्री प्रदान करने वाले सब पदार्थ, और उन के उत्पादन के प्रबन्ध की क्षमता गौ के ही अक्षय प्रताप से उपलब्ध होती  हैं 

 Cows provide action oriented temperaments to attain and develop skills for continuous flow of sustainable of prosperity.

इड एह्यदित्‌ एहि काम्या एत |

मयि व: कामधरणं  भूयात्‌ || यजु 3.27
(हे इडे एहि) हे अन्नरूप गौ ! यहां आ | (हे अदिते! एहि) हे दीनता दूर करने वाली गौ ! यहां आ | (हे काम्या: ) हे सब की कामनाएं पूर्ण करने वाली सब की प्रिय गौ ! यहां आ | (व: कामधरणं  मयि भूयात्‌ ) तुम्हारे अंदर जो सब कामनाएं पूर्ण करने की शक्ति है वह मेरी भी हो |

Cow is called Id.  In Vedic language Id stands for Earth, Food, Speech, Desires and prayers. Cow also fulfils all these. Cow also removes destitution/ poverty. We pray that by presence of cows amongst us, we are blessed with all these bounties through cow.

 Yaju 4.19
 चिदसि मनासि धीरसी दक्षिणासि क्षत्रियासि यज्ञियास्यदितिरस्युभयत: शीर्ष्णी। सा न: सुप्राची सुप्रतीच्येधि मित्रस्त्वा पदि बघ्नीतां पूषाऽध्वनस्पात्विन्द्रायाध्यक्षाय।। Yaju 4.19
 हे गौ !  तुम चेतना प्रदान करने वाली चैतन्य रूपा हो | धी:-  बुद्धि ज्ञान का साधन हो | दक्षिणासि - समस्त कार्यों में दक्षता प्रदान करने वाली हो | क्षत्रियासि - क्षति से रक्षा करने वाली हो | यज्ञों का साधन हो ,मानव जीवन को यज्ञमय बनाती हो |अदितिअसि- जीवन को भोग विलास अलस्य से बिखरने नहीं देती  | उभयत:  शीर्ष्णी – मस्तिष्क को वर्तमान की  और दूरदर्षिता  दोनों प्रकार की दृष्टि देती हो | उत्तम श्रेष्ठ व्यवहार से प्रत्यक्ष में और अप्रत्यक्ष में सकारात्मक मैत्री भाव द्वारा ( मधु विद्या द्वारा ) परम ऐश्वर्य प्रदान कराने  के ,पूषा अध्वन: पातु मार्ग - में सहायक बन कर
कठिनाइयों से रक्षा करती हुई , बध्नताम्‌ - हमें सब बंधनों से मुक्त करती हो |
Cow is the motivator of mind and intellect, provider of strength and valour to warriors, gives indestructible power, through to sides direct & indirect, friends of cow hold  fast on their feet to their path to prosperity, who provide properly for cow and protect her.

Wednesday, August 26, 2015

Productive Prosperous Society

Productive Prosperous Society
Bountiful life AV5.11
अथर्वा वरुण सम्वाद
वरुण से अभिप्राय इस सूक्त के संदर्भ में राजकीय प्रशासन की गुप्तचर न्यायिक व्यवस्था से है, जो जनता के हित में असामाजिक तत्वों और उन की गतिविधियों पर नियंत्रण रखती है.
How to relieve pain of Hedonism
1. कथं महे असुरायाब्रवीरिह कथं पित्रे हरये त्वेषनृम्णः ।
पृश्निं वरुण दक्षिणां ददावान्पुनर्मघ त्वं मनसाचिकित्सीः । ।AV5.11.1
असुरों को जो सदेव खाओ पीओ मौज करने के उपाय खोजते हैं और उन पूर्वजों को जो सदेव जीवन में कष्ट और दु:ख को दूर करने के उपाय खोजते हैं, इन दोनों के मन की चिकित्सा के लिए क्या सर्वहितकारी उपदेश है ?
What are words of wisdom of established truth for hedonists i.e. those who want to seek pleasure in worldly pursuits again and again, and those who seek to avoid pain and discomfort again and again, from bounties of wealth, cows etc.?
Do not be over materialistic
2. न कामेन पुनर्मघो भवामि सं चक्षे कं पृश्निं एतां उपाजे ।
केन नु त्वं अथर्वन्काव्येन केन जातेनासि जातवेदाः । । AV5.11.2
गौ और भूमि के निकट जा कर धन और भोग की बार बार इच्छा करने से कुछ भी प्राप्त नहीं होता. प्रकृति से उपल्ब्धियों को प्राप्त करने के लिए विश्व के समस्त विज्ञान को जानो.
Merely by repeatedly wishing to obtain wealth and pleasure from Nature nothing is obtained without actions and learning the art and science of physical world.
Without making intelligent efforts for utilization of Nature’s bounties , and only by mindlessly continuing to consume them and only by wishing that they will be always similarly available at all times is not possible.
Truthful means are most important
3. सत्यं अहं गभीरः काव्येन सत्यं जातेनास्मि जातवेदाः ।
न मे दासो नार्यो महित्वा व्रतं मीमाय यदहं धरिष्ये । । AV5.11.3
यह एक परम सत्य है कि सृष्टि एक सत्य विधान से संचालित है. जिस को ज्ञान से प्राप्त किया जाता है. प्रकृति के विधान का धनवान या दरिद्र कोइ भी उल्लंघन नहीं कर सकता.
Working of Nature is based on absolute laws based on truth. These can that can be learned by wise persons. But neither powerful nor meek can alter the working of Nature.
Earn living by self efforts not by usurpation
4. न त्वदन्यः कवितरो न मेधया धीरतरो वरुण स्वधावन् ।
त्वं ता विश्वा भुवनानि वेत्थ स चिन्नु त्वज्जनो मायी बिभाय । । AV5.11.4
धैर्य से बुद्धिमानी समझदारी से अपने लक्ष्य को स्वप्रयत्न को प्राप्त करने से अधिक कुछ भी अधिक महत्वपूर्ण नहीं है. जिन को संसार के बारे में जानकारी होती है उन से सब छल और कपट से करने वाले लोग भी दूर भागते हैं ।
Nothing is more important than patient intelligent pursuit by self effort for obtaining your goal. Most unscrupulous persons get scared of the persons that have gathered knowledge about workings of the world.
Earn Livelihood by fair and hard work
5. त्वं ह्यङ्ग वरुण स्वधावन्विश्वा वेत्थ जनिम सुप्रणीते ।
किं रजस एना परो अन्यदस्त्येना किं परेणावरं अमुर । । AV5.11.5
स्वच्छ प्रेरणा से पुरुषार्थ करते हुए सब जन्मों में अपना दायित्व निभाना चाहिए ।
परंतु दूसरों का अहित कर के ऐश्वर्य प्राप्त करने के परे – परिणाम क्या है उस का भी चिंतन करो।
Performance of one’s duty diligently always should be the aim. Reflect also upon the ultimate results of your pursuit of gains at the expense of others
Business Enterprises should be under Watch and Control
6. एकं रजस एना परो अन्यदस्त्येना पर एकेन दुर्णशं चिदर्वाक् ।
तत्ते विद्वान्वरुण प्र ब्रवीम्यधोवचसः पणयो भवन्तु नीचैर्दासा उप सर्पन्तु भूमिं । । AV5.11.6
इस जगत से परे – व्यावहारिक प्रत्यक्ष लोक से पर एक सूक्ष्म तत्व है जिसे विद्वान भी बड़ी कठिनाई से समझ पाते हैं. साधारणत: जो लोग धन प्रधान वृत्ति वाले होते हैं , उनकी सोच , वाणी और व्यवहार बहुच नीच प्रकार के होते हैं , उन को समाज में दबा कर रखना चाहिए ।
Away from this practical world there is a higher world of idealism. Even highly learned persons find it difficult to grasp the ideal behavior in life.
But ordinary class of men for whom money represents most important consideration and thing in life possess very low earthly character. It becomes necessary to exercise very strict down to earth control on the activities of these people.
Control on financial commercial transactions
7. त्वं ह्यङ्ग वरुण ब्रवीषि पुनर्मघेष्ववद्यानि भूरि ।
मो षु पणींरभ्येतावतो भून्मा त्वा वोचन्नराधसं जनासः । । AV5.11.7
बार बार केवल धनोपार्जन के व्यवसायों में बहुत निन्दनीय दोष होते हैं । इन के व्यवहार को ऐसे व्यवस्थित करना चाहिए कि धन की हानि न हो और कोइ निर्धन भी न कहलाए .
Transactions that concern with repeatedly maximizing monetary gains involve many unethical practices. These activities require to be controlled in such manner that no one suffers net financial loss and people are rendered poor and moneyless.
Waste land and more cows
8. मा मा वोचन्नराधसं जनासः पुनस्ते पृश्निं जरितर्ददामि ।
स्तोत्रं मे विश्वं आ याहि शचीभिरन्तर्विश्वासु मानुषीषु दिक्षु । । AV5.11.8
कोई भी निर्धन न रहे,इस के लिए पुन: पुन: भूमि और गौ प्रदान करने से गौकृषि आधारित आजीविका की व्यवस्था होनी चाहिए.
No one should be rendered penniless. Therefore reclaim more and more wastelands and provide for more cows for ordinary people to develop vision of prosperous living.
Explore New avenues of prosperity
9. आ ते स्तोत्राण्युद्यतानि यन्त्वन्तर्विश्वासु मानुषीषु दिक्षु ।
देहि नु मे यन्मे अदत्तो असि युज्यो मे सप्तपदः सखासि । । AV5.11.9
मनुष्य सब दिशाओं में उत्तम प्रकार से फैलें , जो उपलब्धियां अभी तक प्राप्त नहीं हुई हैं उन्हें प्राप्त करें. इस अभियान में मनुष्यों के सप्त पद भू, भुव: , स्वा:, मह:, जन: , तप: और सत्यम्‌ – स्वास्थ,ज्ञान, जितेन्द्रियता,हृदय की विशालता, शक्तियों का विकास, तप और सत्य सब से बड़े सात सखा हैं
People should spread in all directions. Nature provides its bounties from all directions. Our seven faculties – bhu, bhuwah, swah, maha, janah, tapah and Satyam are our best friends to bless us with those bounties in life that we have not earned yet.
All to be equal partners in progress
10. समा नौ बन्धुर्वरुण समा जा वेदाहं तद्यन्नावेषा समा जा ।
ददामि तद्यत्ते अदत्तो अस्मि युज्यस्ते सप्तपदः सखास्मि । । AV5.11.10
हम दोनो राजा और प्रजा, शासन और शासित, धन कमाने वाले और साधन विहीन जन, सब समान बंधु हैं. हमारी उत्पत्ति भी समान है, जब उत्पत्ति समान है तो तुझे नहीं दिया है वह मैं देता हूं इस में हमारे दोनोके सप्त पद भू, भुव: , स्वा:, मह:, जन: , तप: और सत्यम्‌ – स्वास्थ,ज्ञान, जितेन्द्रियता,हृदय की विशालता, शक्तियों का विकास, तप और सत्य सब से बड़े सात सखा हैं
We are all born together as brothers and have the same ideals to pursue in life. Learned people know and tell about each one of us sharing and giving to other what he does not have.
In this we all have our seven best cooperative friends mentioned abov.
11. देवो देवाय गृणते वयोधा विप्रो विप्राय स्तुवते सुमेधाः ।
अजीजनो हि वरुण स्वधावन्नथर्वाणं पितरं देवबन्धुं ।
तस्मा उ राधः कृणुहि सुप्रशस्तं सखा नो असि परमं च बन्धुः । । AV5.11.11
सब मनुष्य देवताओं के गुण से, उत्तम मेधा से युक्त हो कर अपने प्रयत्न से अन्नादि प्राप्त करते हैं । माता पिता और देवता स्वरूप गुरुजनों के बंधु और मित्र बन कर (अथर्वाणम्‌) निरुद्ध चित्त वृत्ति से निश्चित रूप से जीवन में समृद्धि प्राप्त करते हैं .
All men by following the path of self effort, excellent knowledge and yoga attain excellence in life.

Wednesday, May 6, 2015

Nation Building Strategy for Bharat

भारत वासियों के आचरण पर ऋग्वेद का उपदेश  ;
Nation Building RV5.27
राजा के आचरण, गौ और शिक्षा का राष्ट्र निर्माण मे महत्व
6 त्रैवृष्ण्याष्ययरुण:,पौरुकुत्सस्त्रसदस्यु:, भारतोश्वमेधश्च राजान: ।
अग्नि:, 6 इन्द्राग्नी। त्रिष्टुप्, 4-6 अनुष्टुप्।
ऋषि: = 1. त्रैवृष्णा:= जिस के उपदेश तीनों  मन शरीर व आत्मा के सुखों को शक्तिशाली बनाते  हैं
            2. त्र्यरुण:= वह तीन जो  मन शरीर व आत्मा के सुखों को प्राप्त कराते हैं
            3.पौरुकुत्स त्रसदस्य: = जो राजा सज्जनों का पालक व तीन (दुराचारी,भ्रष्ट , समाज द्रोही)
              दस्युओं को दूर करने वाला
            4. राजान भारतो अश्वमेध: ;
                भारतो  राजान:  - राजा जो स्वयं की यज्ञमय आदर्श जीवनशैलि  से प्रजा को भी यज्ञीय
                मनोवृत्ति वाला बना कर राष्ट्र का उत्तम भरण करता है .
               अश्वमेध: - अश्व- ऊर्जा  और मेधा- यथा योग्य मनन युक्त आत्म ज्ञान को धारण करने वाली परम बुद्धि  
 
            इन्द्राग्नी = इन्द्राग्नि: = उत्साह और ऊर्जा से  पूर्ण सदैव अपने लक्ष्य को प्राप्त करने मे विजयी व्यक्ति  Have fire in their belly to be ultimate Doers

COWS’ role in Vision for Nation

1. अनस्वन्ता सत्पतिर्मामहे मे गावा चेतिष्ठो असुरो मघोन: ।
त्रैवृष्णो अग्ने दशभि: सहस्रैर्वैश्वानर ष्ययरुणश्चिकेत ।।RV5.27.1
(सत्पति: ) सज्जनों के पालन के लिए भूत  काल की उपलब्धियों के अनुभव के आधार पर  वर्तमान और भविष्य के लिए (तीनों काल )(त्रैवृष्ण:)में शरीर, मन, बुद्धि  तीनों को  शक्तिशाली बनाने वाली (असुरो मघोन:) ऐश्वर्यशाली प्राण ( जीवन शैलि ) को  (त्र्यरुण:) शरीर , मन और बुद्धि  के लिए ज्ञान ,कर्म और उपासना द्वारा  (दशभि: सहस्रैर्वैश्वानर) समस्त प्रजा की प्रवृत्तियों की  धर्म अर्थ और काम की उन्नति के लिए (अनस्वन्ता) उत्तम वाहनों से युक्त , (गावा चेतिष्ठ:) गौओं द्वारा प्राप्त उत्तम चेतना द्वारा (मामहे) उपलब्ध कराओ.
Current and Future planning should be based on experience of past working results, to obtain excellent Health, Mentality and Intellect in the nation to provide for a prosperous life style. Such a nation is self motivated in following the path of righteous behavior, charitable disposition and God loving conduct in their daily life.
Among other things excellent infrastructure of communication, transport should be provided.
Excellent cows should be ensured to build physically healthy, peaceful and high intellectual society.      
   
Hundreds of well fed cows
2. 2.यो मे शता च विंशतिं च गोनां हरी च युक्ता सुधुरा ददाति ।
वैश्वानर सुष्टुतो वावृधानोऽग्ने यच्छ त्र्युरुणाय शर्म ।। RV 5.27.2
3. (वैश्वानर) धर्म अर्थ और काम को प्राप्त कराने वाली ऊर्जा और (वावृधान: अग्नि:) निरन्तर प्रगति देने वाले यज्ञ (त्र्यरुणाय) शरीर, मन और बुद्धि  के लिए सेंकड़ों गौओं और  बीसियों  उत्तम शकटों से (हरी:) जितेंद्रिय पुरुषों से –भौतिक साधनों और श्रेष्ठ समाज से  युक्त हो कर  (शर्म यच्छ) विश्व का कल्याण  प्राप्त करो
4. Urge for continuous strong positive motivation based activities in individuals creates a prosperous, peace loving, healthy, self disciplined sustainable society with hundreds of cows and dozens of carts loaded with green fodder for cows for  organic food, and good infrastructure base. Nation provided with such infrastructure has a society that is rich in physical resources, and  has well behaved people for welfare of the world.    

Planning in Nation
 
    3. एवा ते अग्ने सुमतिं चकानो नविष्ठाय नवमं त्रसदस्यु: ।
     यो मे गिरस्तुविजातस्य पूर्वीर्युक्तेनाभि ष्ययरुणो गृणाति ।।RV 5.27.3
तेजस्वी विद्वान प्रकृति के विधान और अनुभव से प्राप्त ज्ञान के उपदेशों की कामना करता हुआ सब वासनाओं से मुक्त समाज के निर्माण द्वारा भविष्य के लिए उत्तम नवीन समाज की  आवश्यकताओं की पूर्ती और  तीनो प्रकार तम , मन और आत्मा से सुखी समाज का निर्माण करता है और सब से ऐसी विचार धारा का सम्मान करने को कहता है.
Bright enlightened intellectual leadership seeks guidance from Nature the environment friendly and traditional empirical wisdom to build a hedonism free culture for the growing needs and aspirations of future generations. By honoring and propagating such wisdom only an ideal and happy society is evolved.
Education in Nation

  4. यो म इति प्रवोचत्यश्वमेधाय सूरये ।
दददृचा सनिं यते ददन्मेधामृतायते ।।RV 5.27.4
(राजा का दायित्व है कि ) जो विद्वद्जन (राष्ट्र की उन्नति के लिए) समाज में ऊर्जा (भौतिक और आत्मबल ) के विस्तार और सत्य असत्य के निर्णय करने मे समाज को सक्षम  करने के वेद विद्यानुसार उपदेश करते  हैं,उन को सम्माननीय पद दे  और उन का सत्कार करे.
For growth of the nation it is responsibility of King recognize, honor and promote intelligent teachers that develop the society by educating it in growth conservation of physical energies and their mental energies, with ability to discern truth from untruth.
Bulls make excellent Nation
4. 5. यस्य मा परुषा: शतमुध्दर्षयन्त्युक्षण: ।
अश्वमेधस्य दाना: सोमा इव त्र्याशिर: ।। RV5.27.5
5. (यस्य मा शतम्‌ उक्षण: परुषा:) जो मेरे लिए , सेंकड़ो क्रोध  से  रहित सधे हुए वीर्य सेचन में समर्थ उत्तम वृषभ और  कठिन परिश्रम साध्य बैल, (त्रयाशिर:)   तीनों - बालक,  युवा, वृद्ध तीनों प्रजाजनों  के लिए - राष्ट्र में (अश्वमेध-ऊर्जा और मेधा)  -  तीनों  वसु (भौतिक सुख के साधन) रुद्र रोगादि से मुक्त,आदित्य सौर ऊर्जा के द्वारा, तीनों दूध,दही और अन्न  (सोमा: इव) श्रेष्ठ मानसिकता  तीन प्रकार से  शरीर को नीरोग,मन को निर्मल बुद्धि को तीव्र बनाते और (दाना:)इन दानों से  (उद्धर्ष्यन्ति ) उत्कृष्ट उल्लास का कारण बनते हैं .    
 Bulls that have excellent breeding soundness for providing excellent cows and oxen that are strong and mild mannered to provide power to the nation
Provide excellent health nutrition and intellect to all the three ie.  Infants youth and old persons with three bounties of happiness ie. Healthy environments, cheerfulness and solar energy by the three items of cows milk, curds and organic food to provide the three bounties of healthy disease free life, positive attitudes in life and sharp intellect to spread happiness all round.


6. इन्द्राग्नी शतदाव्न्यश्वमेधे सुवीर्यम् ।
क्षत्रं धारयतं बृहद् दिवि सूर्यमिवाजरम् ।।RV 5.27.6
उत्साह और ऊर्जा से  पूर्ण सदैव अपने लक्ष्य को प्राप्त करने मे विजयी,  योग्य मनन युक्त आत्मज्ञान  को धारण करने वाली परम बुद्धि से युक्त समाज,  असङ्ख्य पदार्थों से सूर्य के सदृश उत्तम पराक्रम तथा बलयुक्त  नाश से रहित महान राष्ट्र का निर्माण होता है.
Thus is created  a Nation that is strong to protect itself from all destructive internal and external enemies, where the society consists of a prosperous , self motivated well behaved intelligent people.