Thursday, November 28, 2013

Terrorism and Nation building in Vedas

Atankvad and Nation Building
RV7.104 reiterated as AV8.4
Twins of: इन्द्रसोम इन्द्रवरुण:, इन्द्राग्नि:,मित्रवरुण: make great contributions in Nation Building.  Here the role of इन्द्रसोम:  has been described.    
राष्ट्र निर्माण में इन्द्रसोम:,  इन्द्रवरुण:, इन्द्राग्नि:,मित्रवरुण: का बड़ा योगदान होता है. इस स्थान पर इन्द्रसोम: पर वेदों का व्याख्यान पाया जाता है.

ऋषि: - मैत्रावरुणिर्वसिष्ठ: । देवता:- (रक्षोघ्नं) इन्द्रासोमौ; 8, 16, 19-22 इन्द्र:; 9, 12-13 सोम:; 10-14 अग्नि:; 11 देवा:; 17 ग्रावाण:; 18 मरुत:; 23 (पूर्वार्धस्य) वसिष्ठाशी: (उत्तरार्धस्य) पृथिव्यन्तरिक्षे ।
त्रिष्टुप्, 1-6, 18,21,23 जगती; 7 जगतीत्रिष्टुप् वा; 25 अनुष्टुप्।
(हरिशरण जी सिद्धांतालंकार – मनोहर विद्यालंकार जी ,  ऋग्वेद के ऋषि: से साभार  )
मैत्रावरुणिर्वसिष्ठ: - तांड्य ब्राह्मण के अनुसार मित्रावरुण प्राण अपान हैं, इन को  पूर्णरूप से सबल
 बनाने वाला ऋषि  मैत्रावरुणि है. यह वश करने वालों में श्रेष्ठ होने से वसिष्ठहैं,अथवा उत्तम निवास शील होने से वसिष्ठहैं | ऐसा मानव जितेंद्रिय हो कर इस शरीर मे वास करता है.  यही बात दूसरी प्रकार से ऐत्रेय  में चक्षु और मन को मित्रावरुणि और इन को वश में रखनेवाले को वसिष्ठ  बता कर उपदेश दिया है. प्रभु से प्रार्थना है कि त्वायुजा पृतनायु रभिष्याम्‌ तेरा साथी बन कर मैं प्रलोभनों की कामादि शत्रुओं की सेना पर विजय पा लूं.  मा नो अग्ने अवीरते परादा दुर्वाससेहम वीर हों अयोग्य जीवनवास करने वाले न हों |
This Sookt of RV 7.104, due to the significance of Nation Building message in it
 is found reiterated in Atharv Ved as AV8.4. IndraSomo इन्द्रसोम: is the operative term of this Sookt .  In Nation Building SOMA correspond to the Staff Functions –the software of Planning - Voice of Civil Society reflected in Judiciary & Govt . INDRA corresponds to the hardware Line Functions the state organs of law enforcement Administration, Police and Defence services. Thus IndraSomo इन्द्रसोम: calls for their synergic operations of intelligence and law enforcement for Nation Building.
It is also noted that severe exemplary punishments are laid down for offenders. Only severe punishments act as true deterrents. Only then a king could proclaim as in Chandogyopanishad5.11 “ न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपो ननाहिताग्निर्नाविद्वान्न  स्वाइरी स्वैरिणी कुत:.”  There are no thieves in my kingdom, no greedy hoarders’ misers, no drunkards, nor those who do not perform Agnihotras, or uneducated persons without wisdom, nor sex offender men hence the question of  female exploitation does not arise.
मेरे जनपद में न चोर हैं, न कृपण, न शराबी,न अग्निहोत्र न करने वाले हैं, न मूर्ख हैं , न व्यभिचारी (पुरुष)  फिर व्यभिचारिणी स्त्री कहां.?  
राष्ट्र निर्माणके लिए इन्द्रसोमो का वर्णन – सोम केवल न्यायोचित सर्वहितकारी मार्ग दर्शन कर  सकता
है परन्तु उस का पालन कराने के लिए जितेंद्रिय राजा को इन्द्र के रूप में  सोम के साथ जुड़ना आवश्यक हो जाता है.
(स्वामी समर्पणानान्द जी के ऋग्वेद मण्डल – मणि –सूत्र पर आधारित )

1.इन्द्रासोमा तपतं रक्ष उब्जतं न्यर्पयतं वृषणा तमोवृध:
परा शृणीतमचितो न्योषतं हतं नुदेथां नि शिशीतमत्रिण: ।।  RV 7.104.1, AV8.4.1
सात्विक ज्ञान से प्रेरित पराक्रम द्वारा , तामसिक हृदय हीन,मूर्खों को तहस नहस कर दो. दूसरों का सर्वस्व खा जाने वालों को सर्वथा क्षीण कर दो.
Motivated with selfless intellect and strength of  your valour, destroy and render  ineffective,  the heartless, lecherous, selfish, wicked elements from society that prosper by usurping the entire wealth of others.  

2.इन्द्रासोमा समघशंसमभ्य1घं तपुर्ययस्तु चरुरग्निवाँ  इव
ब्रह्मद्विषे क्रव्यादे घोरचक्षसे द्वेषो धत्तमनवायं किमीदिने ।। RV7.104.2, AV8.4.2
 पापाभिलाषी जनों को अच्छी तरह से दबा दो.अग्नि पर रक्खी हवि की भांति उन्हें
 संताप प्राप्त हो.असत्याचरण करने वाले, कच्चा मांस खाने की भयंकर दृष्टि से दूसरे के धनादि को हड़प कर जाने वालों पर सदैव द्वेष धारण करो.

3.इन्द्रासोमा दुष्कृतो वव्रे अन्तरनारम्भणे तमसि प्र विध्यतम्
यथा नात: पुनरेकश्चनोदयत् तद् वामस्तु सहसे मन्युमच्छव: ।। RV 7.104.3, AV8.4.3
दुष्कर्म करने वालों को जिन गुफाओं में वे छिपे हैं वहीं घोर अंधकार में ही बींध डालो.झां से एक भी फिर बाहर न आ पाए. तुम्हारा जगप्रसिद्ध बल क्रोध  से युक्त हो कर उन्हे दबाने के लिए हो.


4.इन्द्रासोमा वर्तयतं दिवो वधं सं पृथिव्या अघशंसाय तर्हणम्
उत तक्षतं स्वर्यं पर्वतेभ्यो येन रक्षो वावृधाना निजूर्वथ: ।। RV7.104.4, AV8.4.4
पापाभिलाषी पुरुष के विरुद्ध तुम द्यु से पृथिवी से विनाशकारी अस्त्र का प्रयोग करो.पर्वतों जैसे ऊंचे ऊंचे बादलों से भयङ्कर स्वर वाला शस्त्र उत्पन्न करो, जिस के द्वारा बढ़्ते हुए राक्षस को जला डालो.

5.इन्द्रासोमा वर्तयतं दिवस्पर्यग्नितप्तेभिर् युवमश्महन्मभि:
तपुर्वधेभिरजरेभिरत्रिणो नि पर्शाने विध्यतं यन्तु निस्वरम् ।। RV7.104.5, AV8.4.5
सात्विक ऊर्जा और बल से इन को आकाश से लुढ़का दो.आग से तपे हुए पत्थरों की सी मार करने वाले कभी जीर्ण न होने वाले संतापकारी आग्नेय अस्त्रं द्वारा सर्वभक्षी पापियों की पसलियों को बींध दो, जिस से वे शब्दहीन हो कर चुप चाप दुनिया से चले जाएं.

6.इन्द्रासोमा परि वां भूतु विश्वत इयं मति: कक्ष्याश्वेव वाजिना
यां वां होत्रां परिहिनोमि मेधया इमा ब्रह्माणि नृपतीव जिन्वतम् ।। RV7.104.6, AV8.4.6

 इंद्र- कर्मठ व्यक्तित्व  और सोम- सात्विक बुद्धि द्वारा प्रेरित ज्ञान,  दो बलवान घोड़ों को एक समान रथ में सुशोभित , राज्य के अनुकूल आदेशों को कार्यान्वित  करने का साधन  देखा जाता है.


7.प्रति स्मरेथां तुजयद्भिरेवैर्हतं द्रुहो रक्षसो भङ्गुरावत:
इन्द्रासोमा दुष्कृते मा सुगं भूद् यो न: कदा चिदभिदासति द्रुहा ।। RV7.104.7, AV8.4.7
इंद्र सोम अपने गति साधनों का स्मरण करो. राष्ट्र, समाज द्रोह करने वाले असुर नष्ट करो. समाज राष्ट्र को कष्ट पहुंचाने वाले जन दुष्कर्म कभी भी सुगमता से न कर सकें.

8.यो मा पाकेन मनसा चरन्तमभिचष्टे अनृतेभिर्वचोभि:
आप इव काशिना संगृभीता असन्नस्त्वासत इन्द्र वक्ता ।। RV7.104.8,AV8.4.8
शुद्ध मन से चलने वालों पर जो व्यक्ति झूठे वचनों द्वारा आरोप लगाता है, उस के वचन मुट्ठी में से जल की भांति निकल जाएं. झूठ बोलने वाला व्यक्ति सत्ता रहित हो जाए.

9.ये पाकशंसं विहरन्त एवैर्ये वा भद्रं दूषयन्ति स्वधाभि:
अहये वा तान् प्रददातु सोम वा दधातु निर्ऋतेरुपस्थे ।। RV7.104.9, AV8.4.9
जो दुष्ट हमारे भोजन को मिलावट से निस्सार, अथवा स्वादिष्ट किंतु हानि कारक बना कर अन्न को दूषित करते हैं, ऐसे ठग और शत्रु हीनता को प्राप्त हों उन का सामर्थ्य और व्यवस्था नष्ट कर दी जाए.



10.यो नो रसं दिप्सति पित्वो अग्ने यो अश्वानां यो गवां यस्तनूनाम्
रिपु स्तेन स्तेयकृद् दभ्रमेतु नि हीयतां तन्वा3 तना ।। RV7.104.10, AV8.4.10
जो घोड़ों, गौओं की नसल बिगाड़ते हैं, गौ के दुग्ध को निस्सार करते हैं. वे मानवता के शत्रु और निक्रिष्ट, हीन लोग हैं. उन की सामर्थ्य और व्यवस्था का नाश कर देना चाहिए


11.पर: सो अस्तु तन्वा तना तिस्र: पृथिवीरधो अस्तु विश्वा:
प्रति शुष्यन्तु यशो अस्य देवा यो नो दिवा दिप्सति यश्च नक्तम् ।। RV7.104.11, AV8.4.11
ऐसे दोषी जनों को देश से निष्कासित कारावास दण्ड देना चाहिए.
12.सुविज्ञानं चिकितुषे जनाय सच्चासच्च वचसी पस्पृधाते
तयोर्यत् सत्यं यतरदृजीयस्तदित् सोमोऽवति हन्त्यासत् ।। RV7.104.12, AV8.4.12
परंतु उन के दोष का निर्णय विज्ञान आधारित विद्वान पुरुषों द्वारा  सत्य असत्य के  विचार  के आधार पर होना चाहिए.

13. वा सोमो वृजिनं हिनोति क्षत्रियं मिथुया धारयन्तम्
हन्ति रक्षो हन्त्यासद् वदन्तमुभाविन्द्रस्य प्रसितौ शयाते ।। RV7.104.13, AV8.4.13 सत्य और ज्ञान विज्ञान पर आधारित निर्णय स्वतंत्र न्याय के रक्षा करने वाले हों. वे किसी शक्ति,- धन इत्यादि के  प्रलोभन से  प्रभावित न हों.

14.यदि वाहमनृतदेव आस मोघं वा देवाँ अप्यूहे अग्ने
किमस्मभ्यं जातवेदो हृणीषे द्रोघवाचस्ते निर्ऋथं सचन्ताम् ।। 7.104.14,AV8.4.14
जो असत्याचरण का प्रचार करते हैं, जो वैदिक परम्पराओं के विरुद्ध प्रचार ,समाज में  विद्रोह करते  हैं , उन्हे समाज राष्ट्र के शत्रु के समान दण्डित किया जाना चाहिए. वे मृत्यु दण्ड के योग्य हैं
Those who propagate the untruth, or revolt against the traditional/ Vedic wisdom they should be treated as enemies of the society/ nation. They deserve death sentence.

15.अद्या मुरीय यदि यातुधानो अस्मि यदि वायुस्ततप पूरुषस्य
अधा वीरैर्दशभिर्वि यूया यो मा मोघं यातुधानेत्याह ।। RV7.104.15, AV8.4.15
यदि मैंने स्वार्थवश धूर्ताचरण से समाज का अहित और  पर्यावरण को क्षति पहुंचाने का दोषी हूं तो मै मृत्युदण्ड पाऊं.
If I have caused harm by sorcery/cheating in my self interest to life / health/property/ environments, I deserve to be dead. 

16.यो मायातुं यातुधानेत्याह यो वा रक्षा: शुचिरस्मीत्याह
प्रजापीड़क और जोराजा को भी ना
There may those who are cheats and sorcerers themselves, but accuse me of being one.  They deserve to be exposed as beings of very low character and should be given proper punishment.

17.प्र या जिगाति खर्गलेव नक्तमप द्रुहा तन्वं1 गूहमाना
वव्राँ अनन्ताँ अवसा पदीष्ट ग्रावाणो घ्नन्तु रक्षस उपब्दै: ।। RV7.104.17, AV 8.4.17
जो राक्षस स्वभाव वाला अपने को पवित्राचरण वाला बता कर असहाय सज्जन प्रजाजनों की हिंसा करता है वह निकृष्ट  कर्म करता है, और मृत्यु दण्ड के योग्य है.

18.वि तिष्ठध्वं मरुतो विक्ष्विच्छत गृभायत रक्षस: सं पिनष्टन
वयो ये भूत्वी पतयन्ति नक्तभिर्ये वा रिपो दधिरे देवे अध्वरे ।। RV7.104.18, AV 8.4.18
It is the function of secret services to look for those culprits who conceal their wrong actions by flying like birds in darkness of night, and in their daily activities resort to violent activities.

19.प्र वर्तय दिवो अश्मानमिन्द्र सोमशितं मघवन् त्सं शिशाधि
प्राक्तादपाक्तादधरादुदक्तादभि जहि रक्षस: पर्वतेन ।। RV7.104.19, AV 8.4.19
.(Can we see a suggestion of a Drone like attacks here?
By intelligent innovative methods and adequate financial support, smart sharp  weapons like thunder bolts from sky and all sides may rain on them to destroy them
20.एत त्ये पतयन्ति श्वयातव इन्द्रं दिप्सन्ति दिप्सवोऽदाभ्यम्
शिशीते शक्र: पिशुनेभ्यो वधं नूना सृजदशनिं यातुमद्भ्य: ।।RV 7.104.20, AV8.4 .20
These inhuman persons behave like hungry dogs and want to take on the might of invincible Nationalistic forces. They indeed have to be dealt with like mad dogs.

21.इन्द्रो यातूनामभवत् पराशरो हविर्मथीनामभ्याविवासताम्
अभीदु शक्र: परशुर्यथा वनं पात्रेव भिन्दन् त्सत एति रक्षस: ।। RV7.104.21, AV 8.4.21
ऐसी राक्षस वृत्ति वाले प्रजा पीड़क, आक्रामक, यज्ञ विध्वंसक तत्वों को आमूलनष्ट करना चाहिए .




22.उलूकयातुं शुशुलूकयातुं जहि श्वयातुमुत कोकयातुम्
सुपर्णयातुमुत गृध्रयातुं दृषदेव प्र मृण रक्ष इन्द्र ।। RV7.104.22, AV 8.4.22
समाज से उल्लू की तरह रात्रि के अंधकार में छिप कर अथवा  कर्कश स्वर से चीख कर भयभीत कर के हिंसा करने की , कुत्तों की तरह आपस में लड़ने झगड़ने, भेड़ियों की तरह दूसरों को काटने क्रूर व्यवहार करने की , चकवे –हन्स की तरह कामुक और समलैंगिक व्यवहार करने की  ,गरुड़ की भंति अभिमानी जनों और गिद्ध की भांति लोभ राक्षसी वृत्तियों का उन्मूलन करो.
Destroy the evil spirit of indulging in criminal behaviors like owls by scaring innocent with their shrill noises in darkness and attack, fight and shout at each other like stray dogs, indulge in violence like wolves, exhibit strong sexual behavior like birds particularly homosexual traits of geese, exhibit greed like vultures and egoist proud behavior like golden eagle to eliminate from society.  

23.मा नो रक्षो अभि नडयातुमावतामपोच्छतु मिथुना या किमीदिना
पृथिवी न: पार्थिवात् पात्वंहसोऽन्तरिक्षं दिव्यात् पात्वस्मान् ।। RV7.104.23, AV8.4.23
No terrorists and violence creators should ever be able to show their presence.  
यातना पहुंचाने वाले, राक्षस आदि समा के शत्रु कोई  भी हमारे  निकट ना आ पावे.


24.इन्द्र जहि पुमांसं यातुधानमुत स्त्रियं मायया शाशदानाम्
विग्रीवासो मूरदेवा ऋदन्तु मा ते दृशन् त्सूर्यमुच्चरन्तम् ।। RV7.104.24, AV 8.4.24 प्रजा के शत्रुओं, कुटिल आचरण कर हिंसा करनेवालों को, चाहे वे पुरुष हों अथवा  स्त्री मृत्यु दण्ड दो. अभिचार कर्म करने वाले दुष्ट जन ग्रीवा (गर्दन से )  रहित हो कर नाश को प्राप्त हों. वे आकाश में चढ़ते सूर्य को न देख पावें . 
Those who commit heinous crimes and then murder, they should be hanged from neck to die. The justice should be meted out so expeditiously that they do not see another sun rise.

25.प्रति चक्ष्व वि चक्ष्वेन्द्रश्च सोम जागृतम्
रक्षोभ्यो वधमस्यतमशनिं यातुमद्भ्य: ।। RV7.104.25, AV 8.4.25
सुरक्षा अधिकार्यों को हिंसक समाज के शत्रुओं की गतिविधियों को सदैव ध्यानदे कर विवेचना करनी चाहिए और उन को नष्ट करने के लिए प्रभावशाली उपाय करने चाहिएं.
Intelligence and security agencies should be ever vigilant, and keep a close watch over all terrorist violence enacting elements, analyse their modus operendii and carry out  effective operations to destroy them.







Sunday, November 24, 2013

Domesticated Cows Rig Veda 1.4, AV 20.68

RV1.4, AV20.68  Bounties from a cow
गौपालन से उपलब्धियां
 मधुच्छन्दा वैश्वामित्र: इन्द्र:   गायत्री
Creates a civilized society
सभ्य समाज  बनता है

1.सुरूप कृत्नुमूतये सुदुघामिव गोदुहे जुहूमसि द्यविद्यवि ।।RV 1.4.1,AV20.68.1
Daily efforts in service of good milk giving cows bless us with beautiful bounties.
 प्रति दिन प्रचुर दुग्ध प्रदान करने वाली गौवों की सेवा  से सुन्दर समाज का विकास
 होता है।


Cows are knowledge enhancers   
गौ  बुद्धि बढ़ाती है
       2. उप नः सवनागहि सोमस्य सोमपाः पिब । गोदा इद्रेवतोमदः ।। RV 1.4.2, AV20.68.2
Cows give our vision to make knowledge creating hubs that increase our knowledge resource, makes us more enterprising to be more prosperous and happy.
           गौवों से दिव्य चक्षु मिलते हैं, गौ पालन से  पुरुषार्थी स्वभाव  बनता है, जो सुख और  संपन्नता लाता है
Facilitates Meditation
परमेश्वर का साक्षात्कार होता है
3. अथा ते अन्तमानां विद्याम सुमतीनाम् मा नो अति ख्य गहि ।।RV 1.4.3, AV20.68.3
Makes us hear the voice of our conscience in Meditation
ध्यानवस्था में हर विषय पर सुमति हमारे हृदय में अंतरमन में ही मिलती है. हम अपने अंतर्मन की सुमति का कभी तिरस्कार न करें.
Best Counsel
4.परेहि विग्रमस्तृतमिन्द्रं पृच्छा विपश्चितम् यस्ते सखिभ्य वरम् ।। RV1.4.4, AV20.68.4
May we learn to never ignore the voice of our conscience
हमारी अंतर आत्मा की आवाज़ ही सब से अधिक हितकारी सलाह सिद्ध  होती है.
Enables good articulation

5.उत ब्रुवन्तु नो निदो निरन्यतश्चिदारत दधानेन्द्र इद दुव: ।। RV1.4.5, AV20.68.5
Our speech becomes sweeter and civil
वाणी सदैव उत्तम भद्र बोलें कभी भी अभद्र निंदात्मक अपशब्द न बोलें
Peace loving temperament

6. उत नो सुभगाँ अरिर्वोचेयुर्दस्म कृष्टय: स्यामेदिन्द्रस्य शर्मणि ।।RV 1.4.6, AV20.68.6
A change is brought about in our temperament to earn our living by hard work and fair means. Our prosperity and conduct forces even our enemies to be envious.
हमारा उत्तम श्रमशील जीवन यापन द्वारा प्राप्त सौभग्य समृद्धि तथा भद्र व्यवहार हमारे शत्रुओं को भी हमारी प्रशंसा करने के लिए बाध्य करें.
Makes us Virile & Productive
7. एमाशुमाशवे भर यज्ञश्रियं नृमादनम् पतयन् मन्दयत्सखम् RV 1.4.7, AV20.68.7
Virility is established in our physical body and temperaments to bring forth good progeny and be good achievers in life.
वीर्य वृद्धि से पौरुष द्वारा उत्तम संतान और सोम वृद्धि से  जीवन मे उन्नति समृद्धि प्राप्त कराती है.
Removes obstacles to prosperity

अस्य पीत्वा शतक्रतो घनो वृत्राणामभव: प्रावो वाजेषु वाजिनम् ।। RV1.4.8, AV20.68.8
Our ability is strengthened to perform thousands of tasks to beat all obstacles in the path of our prosperity.
उत्पन्न सोम द्वारा विजय श्री प्राप्त करने के लिए हम शतक्रतु – सेंकड़ों शुभ कार्य करने वाले बनते हैं .
All round Prosperity


तं त्वा वाजेषु वाजिनं वाजयाम: शतक्रतो धनानामिन्द्र सातये ।।RV 1.4.9, AV20.68.9
 Cow develops the inventive temperament to accomplish innumerable techniques required for improving daily life.
(शतक्रतो) असंख्य वस्तुओं के विज्ञान को रखने वाले (धनानाम्‌) पूर्ण विद्या और सामर्थ्य को सिद्ध करने वाले पदार्थों का (सातये) अच्छे प्रकार सुख भोग करने के लिए (वाजेषु वाजिनम्‌) प्राप्त करने में समर्थ (त्वा वाजयाम:) नित्य प्रति जानने और प्राप्त करने के प्रयत्न करते हैं.
Cows provide Divine Blessings
प्रभु कृपा रहती है  

यो रायो3वनिर्महान्त् सुपार: सुन्वत: सखा तस्मा इन्द्राय गायत ।।RV 1.4.10, AV20.68.10..
Makes possible divine blessings by friendly role of the Almighty/
जो असंख्य धनधान्य से समृद्धि देने वाला परमेश्वर है वह एक सखा के रूप में ( गोसेवक के ) साथ रहता है, उसी का गुणगान सब करते हैं.



Monday, November 4, 2013

Vedic Socialism Brotherhood

वेदिक समाजवाद AV 3.30
1.सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि व: । अन्यो: अन्यमसि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या॥ अ‍थर्व 3.30.1
तुम्हारे  हृदय में सामनस्व हो, मन द्वेष रहित हो,  एकीभाव हो. परस्पर स्नेह करो जैसे गौ अपने नवजात बछड़े से करती है.
2. अनुव्रत: पितु: मात्रा भवतु संमना । जाया पत्ये मधुमती वाचं वदतु श न्तिवाम्‌ ॥ अथर्व3.30.2
पुत्र पिता की आज्ञा पालन करने वाला हो. माता के साथ समान मन वाला हो. स्त्री पति के लिए मधुर और शान्ति दायिनी वाणी बोले.
3. मा भ्राताभ्रातरं द्विक्षन्मा स्वसारमुत स्वसा । सम्यञ्च: सव्रताभूत्वा वाचं वदत भद्रया  ॥ अथर्व 3.30.3
 भाई भाई से द्वेष न करे, बहिन बहिन से द्वेष न करे.सब उचित आचार विचार वाले और समान व्रतानुष्ठायी बन कर आपस मे मृदु कल्याणकारी वाणी बोलें .
4.येन देवा न वियन्ति ना च विद्विषते मिथ: । तत्‌ कृन्मो ब्रह्म वो गृहे संज्ञान पुरुषेभ्य: ॥ अथर्व 3.30.4
जिस कर्म के अनुष्ठान से मनुष्य देवत्व बुद्धि सम्पन्न हो कर एक दूसरे से परस्पर मिलजुल कर रहते हैं, आपस में द्वेष नहीं करते , उन  के इस कर्म से ज्ञान प्राप्त कर के  एक्यमत उत्पन्न होता है.
5.ज्यायस्वन्तश्चित्तिनो  मावि यौष्ट संराधयन्त: सधुराश्चरन्त: ॥
अन्यो अन्यस्मै वल्गु वदन्त एत सध्रीचीनान्व: संमनस्कृणोमि ॥ अथर्व 3.30.5
निज निज कर्मों के प्रति सचेत बड़ों के आदर्शों  से प्रेरित अपनाअपना उत्तरदायित्व समान रूप से वहन करते हुए साथ साथ चल कर, प्रत्येक के लिए प्रिय वचन बोलते हुए एक मन से साथ साथ चलने वाले  बनो.  
6. समानी प्रपा सह वोsन्नभागा  समाने योक्त्रेसह वो युनज्मि ।
सम्यञ्चो sग्निं सपर्तारा नाभिमिवाभित: ॥ अथर्व 3.30.6
तुम्हारे जलपानके स्थान एक ही हों, तुमारा अन्न सेवन का स्थान एक हो,No untouchables  , No five star culture .  इस संसार में समान उत्तरदायित्व के वहन में तुम्हें एक जुए में  जोड़ता हूं. जिस के पहियों के नाभि चक्र के अरों - लट्ठों  की तरह
  एक जुट हो कर अग्नि से यज्ञादि शुभ कर्म करो. ( यज्ञ जो संसार में श्रेष्ठ तम कर्म हैं उन  का प्रतीक रूप अग्निहोत्र है. अग्नीहोत्र में मुख्य चारआधाराज्ञ आहुती होती हैं. प्रथम अग्नि को दूसरी सोम को, तीसरी इन्द्र को चौथी प्रजापति को.  सोम को आधुनिक भाषा में ideas,अग्नि को Fire, इन दोनों को मिला कर Ideas on Fire कहा जाता है. जब इन्द्र Entrepreneur इस अग्नि और सोम से प्रज्वलित होते
हैं तभी प्रजापति संसार कि प्रगति के साधन बन कर संसार का पालन करते है. Entrepreneur fired by an idea becomes modern Henry Ford, Bill Gates and Steve jobs. They were not aiming to become rich and famous but were fired by their ideas to bring a Car, a computer, a more convenient communication aid to common man.   भारतीय इतिहास में  चाणक्य, महर्षि दयानंद, स्वामी विवेकानंद , सुभाषचन्द्र बोस,महात्मा गांधी इसी श्रेणी में आते हैं )



7.सध्रीचीनान्व संमनस्यकृणोम्येकश्नुष्ठीन्त्संवननेन सर्वान्‌ ।
देवाइवामृतं रक्षमाणा: सायंप्रात: सौमनसौ  वो अस्तु ॥ अथर्व 3.30.7 

इस उपदेश को ग्रहण कर के तुम सब प्रतिदिन  सायं प्रात: की तरह सदैव एक दूसरे के सहयोगी  बन कर, समान मन वाले हो कर समान भोग करने हो कर मातृदेवों पितृदेवों की तरह सौमनस्य से संसार की अमरता की रक्षा करो.  ,